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“आरोग्य मंदिर या सफेद हाथी? छह महीने से स्वास्थ्य सेवाओं पर लटका ताला”

"कागजों पर इलाज, धरातल पर धूल: आयुष्मान योजना की खुली पोल"

अजीत मिश्रा (खोजी)

🏥जब ‘आरोग्य मंदिर’ ही बीमार हों, तो आम जनता कहाँ जाए? कागजों पर चमक, धरातल पर ताले।🏥

⭐”सरकारी ‘आरोग्य’ खुद बीमार: न डॉक्टर, न दवा, बस इमारतों का दिखावा।

⭐”लाखों के उपकरण खा रहे धूल, जिम्मेदार बोले- ‘स्पष्टीकरण माँगेंगे'”

⭐”बस्ती का हाल: कहीं डॉक्टर गायब, तो कहीं चादरों पर जमी गंदगी की परत”

⭐”स्थानांतरण के बाद भूल गया विभाग: मेहनीना केंद्र में 180 दिनों से तालाबंदी”

⭐”सिस्टम की लापरवाही: गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को 15 किमी की दौड़”

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

 बनकटी ।। सरकार ने ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य क्रांति लाने के बड़े-बड़े वादे किए। ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ इस सपने का आधार स्तंभ थे, जहाँ सामान्य जांच से लेकर दवाएं मुफ्त मिलने का दावा किया गया। लेकिन बस्ती जिले के कुदरहा और बनकटी विकास खंड से आई खबरें इन दावों की पोल खोल रही हैं। विडंबना देखिए कि जिस केंद्र को जीवन देने के लिए बनाया गया था, वह खुद पिछले छह महीने से ‘मृत’ पड़ा है।

💫मेहनीना: स्वास्थ्य सेवाओं की ‘तालाबंदी’

मेहनीना के आरोग्य मंदिर का ताला पिछले छह महीनों से नहीं खुला है। लाखों रुपये (8 से 10 लाख) खर्च कर बनाई गई इमारत और उसमें रखे हजारों के उपकरण अब धूल फांक रहे हैं। यहाँ एक अदद ‘सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी’ (CHO) की तैनाती न होना प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। यहाँ का बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएँ झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में फंसने को मजबूर हैं, क्योंकि सरकारी मंदिर के द्वार उनके लिए बंद हैं।

💫 व्यवस्था या केवल खानापूर्ति?

बनकटी ब्लॉक की पड़ताल से जो तथ्य सामने आए, वे डराने वाले हैं:

👉बजहा केंद्र: यहाँ दोपहर 12 बजे ही ताला लटक रहा था। अधिकारी आए और बिना सूचना के गायब हो गए।

👉खोिरया केंद्र: यहाँ सुबह 11 बजे तक मात्र एक मरीज देखा गया। क्या करोड़ों का बुनियादी ढांचा सिर्फ एक मरीज के लिए है?

👉बरहुआ केंद्र: यहाँ की स्थिति और भी दयनीय है। बेड पर चादर तक नहीं है और धूल की परतें जमी हैं।

💫प्रशासनिक तर्क: जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना

सीएचसी प्रभारी और सीएमओ के बयानों में केवल आश्वासन है। “स्पष्टीकरण मांगा जाएगा” और “तैनाती की जाएगी” जैसे जुमले सालों से दोहराए जा रहे हैं। जब एक एएनएम (ANM) की ड्यूटी कार्ड बनाने में लगा दी जाती है, तो क्लिनिकल सुविधाओं का ठप होना तय है। क्या प्रशासन के पास मैनपावर की इतनी कमी है कि एक काम के लिए दूसरे बुनियादी सेवा को कुर्बान करना पड़े?

यह केवल एक केंद्र के बंद होने की खबर नहीं है, बल्कि यह उस ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता है जिसे ‘आरोग्य’ का नाम दिया गया था। यदि प्रशासन केवल ‘कागजों पर संचालन’ की नीति नहीं त्यागता, तो ये आरोग्य मंदिर केवल सफेद हाथी बनकर रह जाएंगे। जनता को भवन नहीं, सेवा चाहिए।

 

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